मौत से मोक्ष तक का सफ़र तय होता है यहाँ

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गया- गया के अन्तःसलिला फल्गु नदी के किनारे मौत और मोक्ष का है अनूठा संगम। इसी फल्गु नदी के किनारे श्मशान घाट है जँहा मुर्दे जलाए जाते हैं और पास में फल्गु नदी के जल से तर्पण कर मोक्ष की कामना की जाती है। एक ही नदी में लोग मौत से मोक्ष तक सफर तय करते है।

विधारएन्न त कश्चिनन च कश्चन बाहोत।
न दोहेएचच ता धेतु न न कश्चन बन्धयेत

मृत्युलोक में प्राणी अकेला ही पैदा होता है, अकेले ही मृत्यु प्राप्त करता है और अकेले ही पाप-पुण्य का भोग करता है। प्राणी का धन-वैभव घर में तथा परिजन और मित्र श्मशान में छूट जाते हैं, केवल पाप-पुण्य ही जीवात्मा के साथ जाता है। अमावस्या के दिन पितृपक्ष मेला का अंतिम दिन है। कहा जाता है कि गयाधाम में सालो भर पिंडदान, श्राद्धकर्म व कर्मकांड किये जाते हैं लेकिन इस 15 दिनों की अवधि में ऐसी मान्यता है कि पितृ स्वयं यहां आकर अपने-अपने वंशजो का इंतजार करते हैं कि कब मेरा वँशज यहां आएगा और हमे पिंड देगा। इस 15 दिनों की अवधि के दौरान अगर पितृपक्ष मेला के अंतिम में भी उनके वंशज नहीं पहुँचते हैं तो पितृ नाराज हो जाते हैं। इसी धारणा को लेकर आज सुबह से स्थानीय लोगों और तीर्थ यात्रियों के द्वारा फल्गु नदी में जमघट लगा रहा। सभी हिन्दू सनातन धर्मावलम्बी अपने-अपने पितरों को तर्पण व पिंडदान करते हैं।

श्राद्ध शब्द श्रद्धा से बना है, श्राद्ध में कर्ता का यह विश्वाश रहता है कि उनके द्वारा सम्पूर्ण निष्ठा व समर्पण की भावना से ब्राह्मणों को दिया गया दान किसी न किसी रूप में उनके पूर्वजों या पितरों को अवश्य ही मिलता है। श्रद्धा के बिना श्राद्ध की परिकल्पना भी नहीं किया जा सकता है।

यही कारण है कि श्राद्ध के बाद अपने पितरों के प्रति श्रद्धा को दर्शाता है यह पितृपक्ष। इसी अन्तःसलिला फल्गु नदी में कोई अपने परिजनों का श्राद्ध व अंतिम संस्कार कर रहा है तो दूसरी तरफ मृत पितरों के मोक्ष की कामना हेतु तर्पण, पिंडदान करते दिखते हैं।

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