सुपौल लोकसभा संसदीय क्षेत्र

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सुपौल – 2009 में नए परिसीमन के तहत संसदीय नक्शे पर पहली बार सुपौल लोकसभा क्षेत्र बना, वर्ष 2009 में हुए इस लोकसभा चुनाव में क्षेत्र से प्रथम सांसद बनने का गौरव विश्वमोहन कुमार को मिला, जो जेडीयू पार्टी से चुनाव जीतकर संसद पहुँचे। उसके बाद 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में जेडीयू पार्टी ने सिटिंग उम्मीदवार विश्वमोहन को टिकट न देकर दिलेस्वर कामत को अपना प्रत्याशी बनाया, जिनका सीधा मुकाबला महागठबंधन के कांग्रेस प्रत्याशी रंजीत रंजन से था, लेकिन भाजपा प्रत्याशी कामेश्वर चौपाल ने मोदी लहर में इस चुनाव को त्रिकोणीय मुकाबला बना दिया। अंततः बाजी कांग्रेस प्रत्याशी रंजीत रंजन ने मारी, जहाँ रंजीता रंजन को सर्वाधिक 3,32925 वोट आये वहीं दूसरे स्थान पर जदयू के दिलेश्वर कमैत को 2,73255 वोट मिले, भाजपा के कामेश्वर चौपाल को 2,49687 वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे।

अब 2019 सुपौल लोकसभा के आम चुनाव की घोषणा हो जाने से सीट के लिए दलीय उम्मीदवारों के नाम की घोषणा नहीं हुई है। लेकिन, मतदाताओं के बीच पार्टी प्रत्याशियों के नाम की घोषणा नहीं होने से कई तरह के कयास लगाये जा रहे हैं। चूंकि इस बार जेडीयू का फिर से NDA में शामिल होने से यह सीट लगभग जेडीयू के खाते में जाता दिख रहा है, जिससे लोगो में जेडीयू के पूर्व प्रत्याशी दिलेस्वर कामत के नाम की चर्चा आम है। वहीं भाजपा के भी कई कद्दावर नेता इस सीट के लिए सेटिंग में आलाकमान से संपर्क में हैै। जबकि महागठबंधन के कांग्रेस की मौजूदा सांसद रंजीत रंजन का नाम यहां से इस बार भी उम्मीदवारी होने का तय माना जा रहा है।

वहीं इलाके के कद्दावर नेता उर्जा मंत्री विजेंद्र प्रसाद यादव का इस संसदीय क्षेत्र में विधान सभा क्षेत्र होने के कारण काफी जनाधार है, जो पिछले 28 सालो से कोशी की राजनीति में एक अलग मुकाम बनाये हुए हैं, लिहाज़ा इस संसदीय क्षेत्र के किंग मेकर भी माने जाते हैं, वहीं NDA के खाते में यह सीट जाने से वोट बैंक में काफी इजाफ़ा होने की संभावना दिख रही है। जबकि कांग्रेस के रंजीत रंजन को अपने पूर्व के जनाधार और पिछले पांच सालों में क्षेत्र के विकास के नाम पर वोट मिलने की उम्मीद हैं।

अब क्षेत्र के विकास की बात करे तो केंद्र में NDA की सरकार होने के कारण कांग्रेसी सांसद रंजीत रंजन लगतार इलाके के विकास के लिए आवाज़ उठाती रही, चाहे रेल की मांग हो, या कोशी की समस्या का हो, या केंद्रीय विद्यालय की मांग हो। विपक्षी सांसद होने के कारण उतना विकास तो धरातल पर नहीं दिख रहा है, जितना स्थानीय लोगों ने उम्मीद लगा रखी थी।

अब यदि क्षेत्र के जातिगत समीकरण की ओर नजर घुमाएंगे तो सुपौल और आसपास के इलाके में पचपनिया के नाम से पहचाने जाने वाली अतिपिछडी जातियों की ताकतवर लाॅबी हार-जीत का फैसला करती रही है़, सवर्ण जाती, पचपनिया व यादव, दलित मतदाताओं की गोलबंदी महत्वपूर्ण है। इस इलाके में कांग्रेस मैथिल ब्राह्मणों की पसंदीदा पार्टी रही है़। एक ओर पूर्व केंद्रीय मंत्री ललित नारायण मिश्र और डाॅ जगन्नाथ मिश्र की छवि का लाभ कांग्रेस को मिलता रहा है़। जदयू की ताकत भी पिछले चुनाव की तुलना में इस बार बढ़ी है। सुशासन की छवि वाले नीतीश कुमार के पक्ष में सवर्ण मतदाताओं एवं पचपनिया की बड़ी तादाद लामबंद रही है। जबकि MY समीकरण और राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव के पार्टी का भी केडर वोट रंजीत रंजन का पक्ष में माना जा रहा है। आगामी कुछ दिनों में प्रत्याशियों के नाम की घोषणा हो जाने के बाद हवा का रुख क्या होगा, ये देखने वाली बात होगी।

सुपौल लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत कुल 06 विधानसभा क्षेत्र हैं। जिसमें सुपौल, पिपरा, त्रिवेणीगंज, छातापुर, निर्मली व मधेपुरा जिले का सिंहेश्वर विधानसभा शामिल है। इनमें चार पर जदयू और एक-एक सीट राजद व भाजपा के पास है। इस लोकसभा क्षेत्र में मतदताओं की कुल संख्या 14 लाख 81 हजार 907 है। 07 लाख, 72083 पुरुष व 07 लाख, 9787 महिला मतदाता शामिल हैं। जबकि सिंघेस्वर विधानसभा क्षेत्र मधेपुरा जिला में है, इसलिये सिंघेस्वर विधानसभा के मतदाताओं का संख्या इसमें सम्मिलित नहीं किया गया है।