लालू का ब्रह्मास्त्र और नीतीश का आखिरी दांव

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पटना: लालू यादव अपने छोटे लाल और बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी को बचाने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं। जेडीयू और आरजेडी के बीच जमकर बयानों के तीर चल रहे हैं। प्रवक्ताओं में होड़ लगी है कौन कितने कड़े तरीके से और ज़ोर से बोल सकता है। अब तक ना जेडीयू ने खुल कर तेजस्वी से इस्तीफा मांगा है और ना ही आरजेडी ने सरकार गिराने की बात कही है। आखिर इस नूराकुश्ती का अंत क्या होगा ? हर किसी की निगाह इस पर है कि नीतीश क्या समझौता करेंगे या फिर इस्तीफा हो कर रहेगा। लालू अपने बेटे के इस्तीफे से इंकार कर रहे हैं पर कभी ये नही कह रहे कि महागठबंधन को तोड़ने की वजह बनेंगे।

थोड़ा पीछे चलिए जब नीतीश को महागठबंधन का नेता और बिहार का सीएम पद का उम्मीदवार बनाना था तब लालू ने कहा था कि वो ज़हर खाकर भी नीतीश को नेता मान रहे हैं क्योंकि बीजेपी को दूर रखना है। ऐसे में लालू ने अब तक ये नहीं कहा कि बीजेपी को दूर रखने के लिए वो अपने बेटे की कुर्बानी नहीं देंगे। यानी लालू अगर अपने बेटे से इस्तीफा नहीं दिलवाते हैं तो महागठबन्धन के टूटने का ठीकरा लालू पर जाएगा। सीबीआई ने अगर कार्यवाही तेज कर दी तो तेजस्वी को ऐसे भी देर-सवेर इस्तीफा देना ही होगा। ऐसे में पुत्र मोह पार्टी को बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है।

नीतीश ने भी सीधे इस्तीफा न मांगकर लालू को सोचने का काफी वक्त दे दिया ताकि समय रहते सारी तैयारी कर लें। कांग्रेस को भी वक्त दे दिया कि बिहार की राजनीति के लिए अब उन्हें लालू की ज़रूरत नहीं। वो देश की राजनीति में अपनी भूमिका को भी देख रहे हैं। क्या कांग्रेस ने ये तय कर लिया है कि 2019 में मोदी के खिलाफ कोई चेहरा नहीं होगा? ऐसे में महागठबंधन के प्रयोग का परिणाम विपक्ष भी देख ले। देश में महागठबंधन बनाने का सपना कहीं नीतीश की वजह से टूट जाए इसकी भी चिंता लाज़िमी है। अब लड़ाई अपने अंतिम पड़ाव पर है। लालू के पास अब भी वक्त है। नीतीश के हाथ में मास्टर चाभी है जिससे किसी तरफ का दरवाजा खुल सकता है। क्लाइमेक्स का इंतज़ार सबको है।