मीडिया ने फैलाया रायता और किरकिरी हुई नीतीश की

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नाराज़ हैं नीतीश प्रदेश की मीडिया से

पटना – प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मंत्रिमंडल विस्तार और कौन-कौन से वो संभावित चेहरें हैं जिन्हें मंत्रीमंडल में जगह मिलेगी, इन खबरों ने पिछले कुछ दिनों में खूब सुर्खियाँ बटोरी। अफसोस करने की बात ये है कि मीडिया को कोई सही जानकारी नहीं थी फिर भी पत्रकार अटकले लगाने से बाज नहीं आ रहे थे। मीडिया ने ही लोगों को मंत्री बनाया और फिर हटा दिया। एक भी अटकलें निशाने पर नहीं बैठीं। चैनलों और अखबारों की हो रही है सोशल मीडिया पर खिंचाई। क्या मीडिया को इन सब से बाज नहीं आना चाहिए? अगर रिपोर्टर को पता ना हो तो तत्काल वाहवाही लूटने वाली खबरों को चलाने से बचना चाहिए। बड़े- बड़े दिग्गज पत्रकार इस बार औंधे मुंह गिरे और साथ-साथ मीडिया की साख को भी आहत किया।

इस सब के बीच बड़ी बात ये कि मीडिया ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपनी इन हरकतों से खूब शर्मसार किया। जिस तरह से मीडिया खबरें चला रहा था कि जदयू से दो लोग मंत्रीमंडल में शामिल होंगे, फिर ये कि दो पर बात नहीं बनी, साथ ही उन लोगों के नाम भी बताए जा रहे थे जो जदयू से मंत्री बनने जा रहें हैं, इन सब खबरों में किसी भी खबर की पुष्टि ठीक प्रकार नहीं की गई थी।

खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस बात को सूत्रों के साथ साझा किया कि मीडिया उन्हें शर्मिन्दा कर रही है। किसी ने इन खबरों को चलाने से पहले उनसे ये जानने की कोशिश भी नहीं की कि सच्चाई क्या है। आज जब मीडिया ने उनसे इस बाबत सवाल किया तो उन्होंने साफ-साफ बताया कि इस तरह की कोई जानकारी उनके पास नहीं है, ये सभी बातें उन्हें मीडिया से ही मालूम हो रही हैं। नीतीश मीडिया के इस रोल से बहद नाराज़ और दुखी हैं।

उन्होंने सूत्रों से बातचीत में ये भी कहा कि मीडिया को तो इस बात की भी जानकारी नहीं थी कि वो इस्तीफा देंगे और बीजेपी के साथ जाएंगे, फिर केन्द्रीय मंत्रिमंडल में जदयू शामिल होगा ये जानकारी कहाँ से मिल गई?

नीतीश की सबसे बड़ी नाराज़गी की वजह मीडिया में चल रही वो खबरें हैं जिनमें ये बताने की कोशिश हो रही है कि नरेन्द्र मोदी ने नए पार्टनर जदयू को कोई भाव नहीं दिया।

ये सच है कि एनडीए में शामिल होने के बावज़ूद जेडी-यू की नहीं हुई केंद्र में एंट्री, ना प्रस्ताव ही आया और ना जदयू ने शामिल होने की इच्छा ही जाहिर की। बात नहीं बनी, ये कहना गलत है क्यूंकि कोई ऐसी बात थी ही नहीं। नीतीश क्या चाहते हैं और क्या है मोदी की मंशा इस पर सवाल अब भी बरकरार है। कोटा बढ़ाने या फिर मंत्रालय को लेकर नहीं बनने वाली बात भी गलत है।

इस बार की ट्रेन छूट नहीं गई, ट्रेन पकड़नी ही नहीं थी। अगली ट्रेन पर चढ़ना है या नहीं ये भी फैसला अभी हुआ नहीं। जेडीयू के राज्य सभा सांसद आरसीपी सिंह, रामनाथ ठाकुर, सन्तोष कुशवाहा के लिए भी मीडिया ने पैदा की शर्मिंदगी। आरजेडी को भी मिला चुटकी लेने का मौका।

शरद यादव ने तो कह भी दिया कि अस्वाभाविक गठबंधन में अस्वाभाविक बातें ही होती हैं।

क्या मीडिया को अपनी इस हरकत के लिए आत्ममंथन नहीं करना चाहिए? ऐसे तो मीडिया से लोगों का भरोसा ही हट जाएगा। लोग सोच सकते हैं कि मीडिया आधी सच्चाई बता रहा है या फिर कन्फ्यूज कर रहा है। फिलहाल राज्य के मुख्यमंत्री को तो मारे शर्म से लाल-लाल करवा दिया बिन बात के बतंगड़ बना कर। मीडिया का काम खबरें देना हैं, प्रोपेगैंडा नहीं। मीडिया की झूठ पकड़ी गई तो लोग पत्रकारों पर विश्वास करना ही छोड़ देंगे। अटकलों का बाज़ार तत्काल बंद होना चाहिए।