अब मंदार पर्वत पर ले सकेंगे रोपवे का मजा

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सुप्रिया सिन्हा

पटना/बांका- अपनी प्राकृतिक छटा से देसी-विदेशी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करने वाला मंदार पर्वत पर जल्द शुरू होने जा रहा है रोपवे सेवा. पर्वत की चोटी पर पर्यटकों के चढ़ने के लिए रोपवे बनाया जा रहा है. इसका निर्माण कार्य अब अंतिम चरण में है, फलस्वरूप यह इस साल के जून माह से शुरू होने वाला है. यह धार्मिक एवं प्राकृति दृष्टिकोण से अद्भुत स्थल है.

मंदार पर्वत बिहार के बांका जिले में स्थित है. यह भागलपुर से दक्षिण 45 किमी दूरी पर है. इसे मंदराचल (मन्दर + अचल = मन्दर पर्वत) भी कहा जाता है. हिन्दू मान्यताओं के अनुसार मंदार पर्वत के पीछे एक कथा प्रचलित है. माना जाता है कि जब देवताओं और असुरों ने समुन्द्र मंथन किया, तो मंदार पर्वत को मथनी और उसपर वासुकी नाग को लपेट कर रस्सी का काम लिया गया था. पर्वत पर अभी भी धारदार लकीरें दिखती हैं, जो एक दूसरे से करीब छह फीट की दूरी पर है. ऐसा माना जाता है कि समुन्द्र मंथन के दौरान वासुकी के शरीर की रगड़ से यह निशान बने हैं.
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पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार मंदार पर्वत की अधिकांश मूर्तियाँ उत्तर गुप्त काल की हैं. मंदार पर्वत पर हिन्दू जहाँ 33 करोड़ देवी-देवताओं की पूजा करते हैं. वहीँ सफा धर्मावलंबी वनवासी बंधु पर्वत पर अवस्थित प्रभु श्रीराम के चरण चिन्ह को अपनी आस्था से जोड़ते हुए नमन करते हैं. मंदार के सर्वोच्च शिखर पर एक मंदिर है जिसमें एक पद चिन्ह अंकित है. बताया जाता है कि यह चिन्ह भगवान विष्णु के हैं. किन्तु जैन धर्म के लोग इसे प्रसिद्ध तीर्थकर भगवान वासु पूज्य के चरण चिन्ह को बतलाते हैं. पूरे विश्वास और आस्था के साथ दूर-दूर से इनके दर्शन करने आते हैं. एक ही पद चिन्ह को तीन सम्प्रदाय के लोग अलग-अलग रूप में मानते हैं. इसे तीन सम्प्रदाय का संगम भी कहा जा सकता.

यहाँ पर्वत पर भगवान के अनेक सुंदर मूर्तियाँ हैं. मंदार पर्वत का जिक्र पुराण और महाभारत में भी किया गया है. पर्वत के पास एक पापहरणी तालाब है. बताया जाता है कि इस तालाब में चौल वंश के राजा के कुष्ठ रोग दूर हो गये थे. इसलिए इसका नाम पापहरणी पड़ा. यहाँ मकर संक्रांति के अवसर पर प्रति वर्ष मंदार मेले का भी आयोजन किया जाता है. इस साल 14 जनवरी से 17 जनवरी तक चलने वाले मेले में राज्य के पर्यटक मंत्री प्रमोद कुमार भी मौजूद थे. इस मौके पर चार दिनों तक सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं. कहा जाता है भगवान विष्णु यहाँ विराजते हैं. मकर संक्रांति के अवसर पर इनकी शोभा यात्रा पारंपरिक तरीके से पापहरणी सरोवर में खास कर गरुड़ रथ पर निकाली गयी थी.

करीब सात सौ पचास फीट ऊँचे काले ग्रेनाईट के एक ही चट्टान से बना पर्वत पर एक दर्जन कुंद एवं गुफाएं हैं. जिसमें सीता कुंद, शंख कुंद, शुकदेव, मूनी गुफा, राम झरोखा के अलावे पर्वत तराई में लखदीपा मंदिर, कामधेनु मंदिर और अन्य मंदिर मौजूद हैं. जानकारों के अनुसार औरव मुनि के पुत्री समीका का विवाह धौम्य मुनि के पुत्र मंदार से हुआ था. जिसकी वजह से इस पर्वत का नाम मंदार पड़ा था.

मंदार महोत्सव सह बौंसी मेले को राज्य सरकार ने राजकीय मेले का दर्जा प्रदान कर दिया है. सभी कार्यों की प्रशासनिक स्वीकृति दिलाई गयी है. 30 करोड़ की राशि से कांवरिया पथ विकसित किया जा रहा है. धोरैया स्थित मुगलकालीन ईदगाह का जीर्णोधार पर्यटन विभाग कराएगा. मंदार को जैन सर्किट से भी जोड़ा जाएगा. करीब 200 करोड़ की लागत से रामायण और बौध सर्किट का निर्माण हो रहा है.

मंदार पर्वत पर पर्यटकों को मूलभूत सुविधा उपलब्ध कराने की दिशा में तेजी से कार्य चल रहे हैं. पेयजल, शौचालय सहित पर्यटकों के इस्तेमाल में आने वाली सभी सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है. पर्यटकों के ठहरने के लिए गेस्ट हाउस का निर्माण भी किया जा रहा है. जिससे कि देश-विदेश से आए पर्यटकों को कोई दिक्कत का सामना न करना पड़े और साथ ही यह स्थान ज्यादा से ज्यादा लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सके.
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