सुशांत की मौत का राजनीति को ‘हासिल’

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हिसाब जोड़ते हुए हासिल का इस्तेमाल हम सब करते हैं. एक ऐसा था जो नहीं रहा पर हासिल दे गया.  

नहीं रहे सुशांत. शान्ति से बिना कुछ कहे चले गए पर उनकी शांत मृत्यु अपने पीछे मालूम होता है कभी न ख़त्म होने वाला शोर छोड़ गई. भावनाओं का एक बवंडर देश भर में है, मालूम होता है लोगों के मन में सुशांत की मौत को लेकर उबाल है. लोगों का खून खौल रहा है. ये अनुभव करने के लिए आप सोशल मीडिया पर जा सकते हैं. अब ये सोचिए कि जिन राजनीतिक पार्टियों ने इतना शोर सुशांत की मौत के दिन नहीं मचाया वो अब इतना कुछ क्यूँ कह रही हैं?

दरअसल हुआ ये कि सुशांत अपने पीछे एक बड़ा जनाक्रोश छोड़ गए. किसी ने नहीं सोचा था कि बिहार से ताल्लुक रखने वाला एक फ़िल्म स्टार जिसने बहुत कम समय बॉलीवुड में गुज़ारा था, उसके लिए पूरा देश और खासकर युवाओं का बड़ा समूह दीवानगी की हद तक पागल हो जाएगा और लगातार सुशांत को न्याय दिलाने की मांग करेगा. जनभावना एक ऐसी आंधी है जो अपने रास्ते में आए तर्क और सोच-समझ को ध्वस्त करती जाती है. यकीन न आए तो एक बार इतिहास के पन्नों को पलटें. नेता इस बात को बखूबी समझते हैं.

धीरे-धीरे नेताओं ने इस बात को समझा और जनभावना के बयार में खुद को शामिल करना शुरू किया. बिहार की बात करें तो सबसे पहले जाप सुप्रीमो पप्पू यादव ने इस मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग को लेकर केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखा. जवाब में शाह ने कहा कि इस मामले को कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग में बढ़ाया जा रहा है. इसके बाद लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान ने इस बाबत महाराष्ट्र और बिहार के मुख्यमंत्री को पत्र लिखा. फिर पूर्व उप मुख्यमंत्री और राजद नेता तेजस्वी यादव ने इस बात को उठाया. फ़िल्म अभिनेता शेखर सुमन इस मामले को लेकर खासतौर पर पटना आए और तेजस्वी यादव के साथ एक संवाददाता सम्मलेन किया. उन्होंने उस वक्त कहा था कि वे सीएम नीतीश से भी मिलना चाहते थे पर उन्होंने कोरोना की बात कहकर समय नहीं दिया.

इस बीच मुंबई में केस का जांच चल रहा था. रोज़ खबरें आ रहीं थीं कि आज इसको, आज उसको मुम्बई पुलिस ने इतने घंटे पूछताछ की. इस बीच बड़ी बात ये हुई कि बॉलीवुड के अन्दर की सारी गंदगी, सारी दुर्भावना सामने आ गई. अगर आप ट्विटर पर हैं तो जान गए होंगें कि कौन से लोग एक-दूसरे को देखना पसंद नहीं करते, कौन किसको बढ़ने से रोक रहा है आदि आदि. अच्छे-अच्छे लोग यहाँ तक ऑस्कर जीतने वालों ने भी अपना दु:ख ट्विटर पर बताया. फ़िल्म आलोचकों की भी खूब क्लास लगी और जनता ने सभी बड़े-बड़े स्टार्स को खूब प्रताड़ित किया ये सोचकर कि इन्हीं लोगों ने सुशांत को इस हाल तक पहुंचाया है.

बहरहाल सुशांत के पिता ने पटना में एफआईआर कर इस पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया. इसके पीछे और कई कहानियां थीं. अंदरखाने से खबर ये भी है कि इस एफआईआर को लेकर बिहार पुलिस भी आश्वस्त नहीं थी. इस मामले को लेकर कानूनी अड़चनें और प्रोटोकॉल के सवाल भी थे. क्या एक ही मामले में दो राज्य की पुलिस जांच कर सकती है, ये सवाल भी था? समझदार समझ गए थे कि ये बिहार चुनाव को लेकर लिखी पटकथा है पर मामला जनभावना का है इसलिए बोलना वही है जो सुशांत के चाहनेवाले चाहते हैं क्यूंकि उनके साथ एक विशाल संख्याबल है.

बिहार के योजना एवं कल्याण मंत्री महेश्वर हजारी इस मामले में आरोपी रिया चक्रवर्ती को विषकन्या और सुपारी किलर बोलकर सुर्ख़ियों में हो गए. राजनीति समझ गई थी कि क्या बोलने पर तालियाँ मिलेंगी और समर्थक बढेंगें. जैसे ही पटना में सुशांत के पिता ने एफआईआर दर्ज करवाई और लोगों को पता चला कि ये बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पहल पर हुआ है सारे पार्टियों के नेता तिलमिला से गए, ऐसे मानो नीतीश उनका जनाधार हड़प रहे हों. अचानक नेताओं के सुशांत मामले पर बयान पर बयान आने लगें कि वो किस तरह चाहते हैं कि सुशांत को न्याय मिले और ज्यादातर लोगों ने सीबीआई से जांच की मांग की.

अब याद कीजिए पाईड पाइपर ऑफ़ हैमलिन की कहानी और सोचिए कि इस कहानी में पाईड पाइपर कौन है जो अंत में बाजी मारता दिख रहा है. कहावत खूब सुना होगा: सौ सुनार की, एक लोहार की. नेता सुशांत-सुशांत रटते रहे पर बिहार सीएम नीतीश कुमार ने इस मामले में एंट्री तब मारी जब मीडिया खासकर टीवी पत्रकार उनके पीछे हाथ धोकर पड़ गए थे और गिन गिन कर उनके सरकार की विफलताएं और बिहार की बर्बादी दिखाने लगे. चाहे सत्तरघाट का मामला हो, कोरोना अस्पतालों की दर्दनाक तस्वीरें या बाढ़ में बेदम होती जनता – मीडिया और विपक्ष एक सुर हो चले थे. इसे नीतीश कुमार का मास्टर स्ट्रोक कहें या सोची-समझी रणनीति, उन्होंने एक स्ट्रोक से इलेक्ट्रोनिक मीडिया का एजेंडा सेट कर दिया और बिहार के बदहाली की तस्वीरों को सुशांत की खबरों ने ढक दिया. कुछ वक्त के लिए ही सही बिहार सरकार ने राहत की सांस ली होगी. हालांकि नीतीश इस बात से इंकार करते हैं, कहतें हैं ये राजनीति नहीं, सुशांत के पिता ने एफआईआर किया है तो स्टेट की जिम्मेदारी हो जाती है सुशांत को न्याय दिलाने की. बिहार के साथ-साथ देश भर में लोग इस मामले को लेकर दुखी हैं. कई लोग कहते रहें कि नीतीश तो सुशांत के परिवार से मिलने भी नहीं गए, इस पर बिहार के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे ने सफाई देते हुए कहा है कि मैं सबसे पहले मुख्यमंत्री का प्रतिनिधित्व करते हुए उनका शोक सन्देश लेकर गया था और उस दिन से हमलोग चिंतित हैं.

सोचिए बिहार का एक लड़का मृत्यु पश्चात भी कितनों को क्या-क्या दे गया. देखना होगा कि क्या बिहार चुनाव में वोट भी दे जाएगा ?

हम भी चाहते हैं कि बिहार के बेटे सुशांत सिंह राजपूत को न्याय मिले और सच्चाई सबके सामने आए पर जैसा कि  हरिशंकर परसाई लिख गए हैं : झूठ बोलने के लिए सबसे सुरक्षित जगह अदालत है ! – पता ही नहीं चल रहा क्या झूठ है और क्या सच. कभी पता चल पाएगा ऐसी गुंजाइश भी नहीं लग रही.