सोशल मीडिया के एक संदेश से जलता देश!

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भोजपुर – आरक्षण को लेकर देश भर में जातिवाद दंगल जारी है कहीं कोई आरक्षण के पक्ष में तो कहीं कोई आरक्षण के विरोध में भारत बंद कर रहा है, मगर बहुतेरे सवाल आज हर किसी के जेहन में है कि इतने कम समय में इतने सारे लोग अचानक सड़क पर आ कहाँ से जाते हैं? ये रोज-रोज के आंदोलन किस गर्भ से जन्म ले रहें हैं? इसमें शामिल होने वाले असामाजिक तत्व आखिर हैं कौन? और इनसब के बीच सबसे बड़ी बात कि इन्हें कौन इकठ्ठा कर रहा है? आखिर कौन है इनका सबसे मददगार साथी?

तो आपके सारे सवालों के जवाब में हम आपको यह बता दें कि जिस सोशल मीडिया को आप मनोरंजन या सूचना के प्रसारण के तौर पर देखते हैं वो वास्तव में अब यह सोशल मीडिया समाज के लिए एक बहुत बड़ा हथियार बन गया है. सोशल मीडिया के द्वारा 2 अप्रैल और 10 अप्रैल को बुलाए गए भारत बंद ने जिस तरह देश के कई हिस्सों में लाशों को गिराया, ठीक उसी दिशा में एक बार फिर से आंदोलन की नींव रखी जा रही है. आजकल फिर से उसी सोशल मीडिया में 14 अप्रैल को भारत बंद का आह्वान किया जा रहा है, यानि यह साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि भारत बंद के नाम पर भारत एक बार फिर से जलने के लिय तैयार हो जाये.

दूसरे शब्दों में आप यह समझें कि उन परिजनों के आँखों के आँसूं भी अबतक नहीं सूखे होंगे जिन्होंने पिछले भारत बंद के दौरान अपनों को खोया है कि उनके पड़ोस में फिर से पिछली बार के आंदोलनों के जैसे दर्जनों लाशें गिरने वाली है क्यों की पहले 2 अप्रैल और उसके बाद 10 अप्रैल को जिस तरह पुलिस या सरकार इस प्रकार के संदेशों को सोशल मीडिया पर हल्के में ली थी वही हल्कापन इस बार भी देखा जा रहा है… इस बार भी सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीर बिलकुल उसी तबाही का संदेश लेकर आई है फर्क बस इतना है कि तारीख़ और रंग थोड़े बदल से गए हैं मगर यकीन मानिये अगर पुलिस प्रशासन इस वायरल तस्वीर को लेकर सख्त नहीं होती है तो आने वाली 14 अप्रैल को फिर वही मंजर आपके सामने टेलीविजन चैनल पर दिखेगा जैसा की आपने बीते 2 अप्रैल और 10 अप्रैल को देखा था. उस वक़्त भी बंद का आह्वान सिर्फ सोशल मीडिया पर ही किया गया था पिछली बार की तरह इसबार भी न तो कोई विशेष चेहरा है और न ही कोई विशेष संगठन सामने आया है सिर्फ एससी/एसटी दो नामों के आलावा. जिस तरह से पूर्व की भलीभांति इसबार भी इस प्रकार का जहरीला संदेश सोशल मीडिया के समंदर पर तैर रहा है, तो इस किनारे पर मोबाइल फ़ोन लिए खड़े हर एक सोशल मीडिया यूजर्स को यह संदेश साफ़ तौर पर समंदर में दिखाई भी दे रहा है.

आखिर में सवालों की परिधि में हम उन्हें भी लेते हैं जिनके जिम्मे इस प्रकार के समाज के लिए घातक वायरल तस्वीरों को रोकने की जिम्मेदारी है. आखिर क्यों गृह मंत्रालय या स्थानीय पुलिस प्रशासन उनलोगों के खिलाफ साइबर क्राइम के तहत केस दर्ज कर कार्रवाई नहीं करती जो इस तरह से समाज में अस्थिरता फ़ैलाने की साजिश रचते हैं, आखिर क्यों कुछ लोग अपने नकारात्मक मंसूबों में कामयाब हो जाते हैं. और आखिर में एक सवाल यह भी है कि प्रशासन के पास सारे शक्ति और कानून होने के बावजूद भी बार-बार देश जलने को क्यों मजबूर हो जा रहा है?

हालांकि पिछली बार 10 अप्रैल के संदेश को लेकर गृह मंत्रालय थोड़ी जगी थी और बाकायदा उसने राज्य सरकारों को एडवाइजरी जारी कर अलर्ट भी किया था मगर कुछ ही राज्यों जैसे मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सों में कर्फ्यू लागू कर दिया गया था तो वहीँ दूसरी ओर बिहार सहित कुछ राज्यों में दस अप्रैल को स्कूल, कॉलेज बंद कर दिए गए थे, तो कहीं बारह बजे रात से ही इंटरनेट की सेवाएं बंद कर दी गईं थी. राजस्थान में भी कई जगहों पर इंटरनेट सेवाएं रोक दी गईं थी. हालांकि इन सबके बीच पुलिस प्रशासन के लिए मुश्किल सवाल ये था कि वो एहतियाती कदम तो उठाएं लेकिन नजर किस संगठन पर रखें कि संभावित हिंसा को रोका जा सके क्योंकि ना कोई बैनर, ना कोई झंडा और ना ही कोई विशेष चेहरा था. किसी ने इस बंद के ऐलान की जिम्मेदारी तक नहीं ली थी. इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि ऐसे आंदोलनों से राजनैतिक बू नहीं आ रही है. आखिर समाज में शांति भंग करने वाले असामाजिक तत्वों के ऊपर कार्रवाई कब की जाएगी, कब उन सैकड़ों दोषियों को सलाखों के पीछे धकेला जायेगा वो किसी खास मंसूबे के तहत इस तरह के संदेश फेसबुक, व्हाट्सअप, इन्स्टाग्राम, ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया के जरिये समाज के बीच में फैला रहें हैं.

सवालों की परिधि :-

1. सूचना प्रसारण के क्षेत्र में क्रांति लाने वाला सोशल मीडिया क्या अब समाज के लिए घातक साबित हो रहा है?

2. सोशल मीडिया पर इस तरह के वायरल संदेश अब वायरस संदेश नहीं हो गए हैं?

3. आखिर कौन है इनसब के पीछे?

4. क्या सामाजिक न्याय के नाम पर राजनीति नहीं हो रही है?

5. चुप क्यों है सरकार और क्यों बंधे हैं कानून के लंबे हाथ?