सुशांत और मीडिया: क्या सोच रहें हैं लोग ?

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श्वेताम्बरी सिंह 

बहुत दिनों से न्यूज़ चैनल्स पर दिखाए जा रहे एक युवा फिल्म कलाकार सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के समाचार को मैं भी देख रही हूँ। सभी चैनल्स पर दिखाए जा रहे समाचार से पहले मुझे भी लगा कि परिवारवाद के कारण इस कलाकार ने आत्महत्या कर लिया।

बॉलीवुड के भाई-भतीजावाद पर तक़रीबन सभी चैनल्स ने जंग छेड़ दिया वैसे ही जैसे ये अपने चैनल्स पर ही भारत और पाकिस्तान या फिर चीन के साथ युद्ध करवाते रहते हैं। इन्होंने सारे तफ़तीश कर लिए और ये साबित भी कर ही दिया था कि उस युवा कलाकार ने आत्महत्या nepotism के कारण किया लेकिन तभी उस कलाकार के पिता ने एफ़॰आई॰आर॰ दर्ज करवाकर इनके सारे तफ़तीश पर पानी फेर दिया। या यूँ कहें इनके टीआरपी को बरकरार रखने का मौक़ा मिल गया।

अब चैनल वाले अपने रिपोर्टर को सी॰बी॰आई॰से पहले अपना जाँच पूरा करने की जिम्मेदारी दे चुके है। फ़िलहाल भारतीय मीडिया में और कोई ख़बर नहीं है जो लोग देखना चाहते हैं. ऐसा मान लिया गया कि लेबनान में हुए धमाके में भारतीय लोगों को कोई दिलचस्पी नहीं है। देश की राजधानी में निर्भया जैसी एक और वारदात हुई उस ख़बर को दिखाने के लिए हमारे देश की मीडिया को अभी फ़ुर्सत नहीं है, कोई छोटा सा ख़बर बना कर दिखा दिया क्योंकि अभी उस कलाकार के हत्या या आत्महत्या की गुत्थी सुलझाना है.

मैंने पढ़ा है कि समाचार की परिभाषा ही यही है कि “जिस घटना के साथ लोगों की रुचि हो उसे समाचार कहते हैं।” फ़िलहाल सभी चैनल्स में होड़ लगी है कि कौन सबसे पहले कोई नयी ख़बर का BREAKING NEWS दिखाता है। कुछ चैनल्स तो इस कदर शीशे के टूटने की आवाज़ के साथ ख़बर BREAK करते हैं मानो सच्चाई उसी शीशे को तोड़ कर आपके सामने आ गई हो, भले वो ख़बर चंद घंटे बाद कोरी अफ़वाह ही क्यूँ ना हो जाए।

हमारे यहाँ मीडिया ख़बर नहीं बताता वो सीधे फ़ैसला सुनाता है। किसी को इतना मासूम बना देता है और किसी को सबसे बड़ा गुनहगार । मीडिया को थोड़ा संवेदनशील होना चाहिए ताकि किसी बेगुनाह के दामन पर कोई दाग ना लगे।