तो गया में तिलकुट की शुरूआत डेढ़ सौ साल पहले गोपी साव नामक हलवाई ने रमना रोड में की !

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गया – मकर संक्रांति को लेकर गया का तिलकुट व्यवसाय इन दिनों अपने पूरे परवान पर है। 14 जनवरी को मकर संक्रांति पूरे देश में मनायी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन तिल खाने और दान करने का विधान है। इसे लेकर तिलकुट की मुख्य मंडी गया के रमना रोड और टिकारी रोड की दुकानें सजी हुई है। जहां लोग तिलकुट की खरीददारी कर रहे हैं।

वैसे तो गयाजी प्राचीनतम धार्मिक नगरी है। यह शहर मोक्षाधाम के रूप में प्रख्यात है। लेकिन गया की पहचान तिलकुट के अनूठे स्वाद के लिए भी जानी जाती है। यहां के नरम और खास्ता तिलकुट की मांग देश-विदेश तक है। ठंड के मौसम में तिलकुट की मांग काफी बढ़ जाती है। तिलकुट की तासिर गर्म होती है। यह आयुर्वेदिक दवा का भी काम करता है। तिलकुट खाने से कब्जीयत जैसी बीमारी नहीं होती है साथ ही यह पाचन क्रिया को भी बढ़ाता है। तिलकुट निर्माण के लिए गया की जलवायु भी काफी अच्छी मानी जाती है। यहां का मौसम और पानी इसके निर्माण में काफी उपयोगी सिद्ध होता है। वैसे तो यहां सालो भर तिलकुट की बिक्री होती है, लेकिन सर्द मौसम आते ही इसकी मांग बढ जाती है। अक्टूबर माह से शुरू होते ही सोंधी महक से शहर गुलजार हो जाता है। यह तिलकुट किसी फैक्ट्री या किसी मशीन से नहीं बनाई जा सकती है, बल्कि हाथ से कुटे जाने वाले मिठाई है तिलकुट।

गया में तिलकुट की शुरूआत डेढ़ सौ साल पहले गोपी साव नामक हलवाई ने रमना रोड से की थी। उसके बाद उनके वंशज आज तक इस पारंपकि तिलकुट व्यवसाय को करते आ रहे हैं। हालांकि अब रमना और टिकारी रोड में कई दुकानें खुल चुकी है। जहां काफी मात्रा में तिलकुट बनायी जाती है। वैसे तो पूरे देश में कई जगहों पर तिलकुट का व्यवसाय होता है। लेकिन गया में निर्मित तिलकुट और उसके स्वाद का मुकाबला कहीं नहीं है। यहां के तिलकुट के स्वाद का जोड़ कहीं नहीं है। यही वजह है कि गया में निर्मित तिलकुट झारखंड, उतरप्रदेश, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, महाराष्ट्र सहित पाकिस्तान, बांगलादेश जैसे देशों में भेजी जाती है। गया आने-जाने वाले लोग यहां के तिलकुट का स्वाद जरूर लेते हैं और अपने दूर दराज के रिश्तेदारों के लिए भी झोले में भरकर तिलकुट को ले जाते हैं।