टेरी ने किया बिहार के 50,000 ग्रामीण घरों को स्वच्छ ऊर्जा से रौशन

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पटना – भारत ऊर्जा की कमी वाले देश से आगे बढ़कर अब अतिरिक्त ऊर्जा वाला देश बन चुका है। इसके अलावा, केन्द्र की सौभाग्य योजना के तहत वर्ष 2019 तक सभी गांवों में बिजली पहुंचाने का काम चल रहा है। सार्वजनिक —निजी भागीदारी (पीपीपी) के तहत ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला की कमियों को दूर कर और वितरित अक्षय ऊर्जा (डिस्ट्रीब्यूटेड रिन्यूएबल एनर्जी) (डीआरई) के माध्यम से स्वच्छ, भरोसेमंद, और कम लागत वाली ऊर्जा उपलब्ध करा कर इस परिकल्पना को मूर्त रूप देने में सफल हुआ जा सकता है। इसके साथ ही, और लाइटिंग अ बिलियन लाइव्स (एलएबीएल) अभियान के तहत, एनर्जी एडं रिसोर्स इंस्टीट्यूट (टेरी) ने बिहार आजीविका संवर्धन समिति (बीआरएलपीएस) के जीविका कार्यक्रम में अभिनव संस्थागत माडल के माध्यम से भागीदारी की है ताकि स्थानीय महिलाओं के स्वसहायता समूहों (एसएचजी) को स्वच्छ ऊर्जा के उत्पाद कम कीमत पर मिल सकें।

इस कार्यक्रम से अब तक, बिहार के 50,000 घरों को सौर ऊर्जा से घर को रौशन करने की प्रणाली सोलर होम लाइटिंग सिस्टम (एसएचएलएस) और खाना पकाने के लिये सौर ऊर्जा स्टोव उपलब्ध कराकर लाभान्वित किया गया है। कार्यक्रम का उदेश्य ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका की स्थिति बेहतर बनाने की सरकार की परिकल्पना में पूरके के तौर पर गांवों में प्रत्येक घर को भरोसेमंद ऊर्जा उपलब्ध कराना है। इस पीपीपी माडल के तहत जीविका कार्यक्रम के स्वसहायता समूहों की बचत से 60 प्रतिशत राशि और शेष 40 प्रतिशत राशि टेरी को मिलों अनुदानों और सीएसआर कोष से उपलब्ध कराई जायेगी। गया, खगड़िया, मधुबनी, पूर्णिया और पश्चिम चंपारण जिलों में रह रहे कार्यक्रम के लाभान्वितों को अनियमित बिजली आपूर्ति से कठिनाई का सामना करना पड़ता है। इस कार्यक्रम से अकेले पूर्णिया में 28,261 घर लाभान्वित हुए हैं। टेरी के प्रयासों से इन समुदायों के घरों में न केवल खाना बनाने और बिजली की स्थिति में सुधार हुआ है बल्कि इससे उनकी शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति भी बेहतर हुई है। इसके अलावा, इस कार्यक्रम के तहत सौर उत्पादों के जरिये शाम के अतिरिक्त घंटों में बिजली मिलने से बुनाई, सिलाई, माल बेचने जैसे छोटे मोटे करोबार से भी आजीविका अर्जन में बढोत्तरी संभव हो पाई है।

टेरी के महानिदेशक डा. अजय माथुर ने प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि टेरी—जीविका परियोजना ने यह साबित कर दिया है कि सरकारी एजेन्सियों, स्थानीय समुदायों और निजी क्षेत्र को मिलाकर बना एक शक्तिशाली विकेन्द्रित माडल, उन गांवों में भी बिजली की कमी को दूर कर सकता है जो ग्रिड से जुड़े हैं। वितरित अक्षय ऊर्जा (डीआरई) को अगर ग्रिड का सहारा मिल जाये तो यह ग्रामीण इलाकों में भरोसेमंद और गुणवत्तापूर्ण बिजली उपलब्ध कराती है, और साथ ग्रिड के अंत में वोल्टेज की स्थिरता सुनिश्चित करती है। बिहार में टेरी—जीविका कार्यक्रम बिजली सेवा आपूर्ति के मामले में उद्यमिता माडल पर काम कर रहा है जिसमें टेरी ने ऐसे लगभग 20 ऊर्जा उद्यमियों को प्रशिक्षण दिया है और उन्हें परामर्श देती है जो पंजीकृत निमार्ताओं से घरों के लिये सौर ऊर्जा प्रणाली और स्टोव लेते हैं, उन्हें लोगों के घरों में लगाते हैं, और 300 सौर तकनीशियनों के सहयोग से उनका रखरखाव सुनिश्चित करते हैं। विक्रय के बाद की सेवाओं और शिकायतों का निपटारा एक केन्द्रीयकृत काल सेन्टर और व्हाट्सअप आधारित सेवाओं के माध्यम से उपभोक्ताओं को उनके क्षेत्र के तकनीशियनों से जोड़ कर किया जाता है।

इस कार्यक्रम की सफलता के साथ ही, ऐसे ही ग्रिड से जुड़े डीआरई समाधान अन्य राज्यों में भी अपना कर पिछड़े ग्रामीण इलाकों में ऊर्जा की समुचित व्यवस्था की जा सकती है। टेरी ने वर्ष 2008 में लाइटिंग बिलियन लाइव्स (एलएबीएल) अभियान शुरू किया था जिसका उदेश्य किरासन तेल की जगह सौर ऊर्जा का उपयोग शुरू करना और स्थानीय उद्यमियों को जोड़ कर कुशल और भरोसेमंद ऊर्जा आपूर्ति करना था। अभियान के माध्यम से स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने वाले उपकरणों का उपयोग बढ़ाकर घरों में होने वाले वायु प्रदूषण के एक प्रमुख मुद्दे को हल करने की दिशा में भी पहल की गई है। रोशनी के लिये और स्टोव में किरासन तेल का उपयोग करने से घरों में प्रदूषण बढ़ता है, जिससे गरीब परिवारों के लोगों, खासकर महिलाओं और बच्चों, के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ब्रिटिश सरकार के अंतरराष्ट्रीय विकास विभाग (डीएफआईडी) ने टेरी—जीविका कार्यक्रम के लिये अनुदान दिया है जबकि पावर फिनान्स कारपोरेशन (पीएफसी), एग्रीकल्चर इंश्योरेन्स कंपनी (एआईसी) आफ इंडिया लिमिटेड जैसी कंपनियों ने अपने कारपोरेट सामाजिक दायित्व अभियान के तहत धनराशि उपलब्ध कराई है।