आखिर, नीतीश चाहते क्या हैं ?

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महागठबंधन टूटेगा या बचेगा? नीतीश की राजनीति क्या कहती है? क्या नीतीश एनडीए में जाएंगे ? ये वो सवाल हैं जो हर किसी के ज़हन में हैं।

एक समय था जब नीतीश ने कहा था कि मिट्टी में मिल जाएंगे पर बीजेपी के साथ नहीं जाएंगे। ये वो ऐलान है जिसे नीतीश ने उस वक्त किया था जब बीजेपी के साथ दोबारा जाने की मंशा पर सवाल उठा। क्या नीतीश के इस बयान पर भरोसा किया जा सकता है ? इसे समझने के किए कुछ और पीछे चलना होगा। लालू के साथ दोस्ती पर क्या कुछ नहीं कहा। कांग्रेस के बारे में क्या-क्या सवाल नहीं उठाए? पर नीतीश आज लालू के दोस्त हो गए। कॉंग्रेस की नैया के खेवनहार हो गए। लेकिन वक्त ने एक बार फिर करवट ली है। बिहार में राजनीतिक उठापटक का दौर जारी है। नोटबंदी, सेना का सर्जीकल स्ट्राइक, राष्ट्रपति चुनाव और जीएसटी पर केंद्र सरकार को समर्थन देकर नीतीश क्या संदेश दे रहे हैं ?

राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की राजनीति में नीतीश को दरकिनार करने की कोशिश हो रही है जिसे नीतीश समझ गए हैं। यूपी चुनाव में पार्टी को चुनाव लड़ाने के मंसूबों पर कांग्रेस ने पानी फेर दिया। नीतीश ने खुले मंच से कांग्रेस से अपील की। कहा कॉंग्रेस बड़ी पार्टी है, उसे विपक्ष को एक करना चाहिए पर कांग्रेस के नेता सी पी जोशी ने कहा कि महागठबंधन सिर्फ बिहार में है। देश की राजनीति में अपनी अहम भूमिका के सपनों को चकनाचूर होते देख नीतीश एक के बाद एक ऐसे फैसले ले रहें है जिससे विरोधी दल असमंजस में आ गए हैं। नीतीश एक ओर लालू खानदान पर अकूत बेनामी संपत्ति जमा करने के आरोपों से उनकी सरकार की छवि पर आ रही आंच से परेशान हैं तो वहीं कांग्रेस के अस्पष्ट नीति से भी पशोपेश में हैं। कांग्रेस ने अब तक किसी को भी प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं बनाया है और इस बारे में कांग्रेस का ढुलमुल रवैया है। राष्ट्रपति चुनाव में लालू ने कांग्रेस का साथ देकर नीतीश को जता दिया कि वो बिहार में भले ही नीतीश के साथ हों पर केन्द्र में फिलहाल वे कांग्रेस के साथ हैं। ऐसे में कांग्रेस और लालू दोनों के साथ एक-एक दिन चलना मुश्किल हो रहा है। कांग्रेस अपनी शर्तों पर नीतीश को साथ लेकर चलना चाह रही है तो नीतीश पिछलग्गू बनकर खड़े रहने को तैयार नहीं। ऐसे में महागठबंधन का क्या होगा?

बिहार की राजनीति में नीतीश की स्थिति उस रस्सी पर चलने वाले खिलाड़ी की सी है जो बड़ी मुश्किल से बांस के सहारे सन्तुलन बनाए रखता है। एक ज़रा सी चूक से सारा खेल बिगड़ सकता है। एक बार लालू तो दूसरी बार कॉंग्रेस, दोनों को समय-समय पर उनकी जगह बताते रहते हैं। नीतीश ने साफ कर दिया है कि उन्होंने असम चुनाव और यूपी चुनाव में विपक्ष को एक करने की कोशिश की पर अब वो ऐसी कोई कोशिश ही नहीं करेंगे।

नीतीश के सामने दो चुनौती है। बीजेपी के साथ जाएं या फिर कांग्रेस से अलग तीसरे फ्रंट को नए सिरे से जिंदा करने की कोशिश करें। एक ओर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने की जद्दोजहद है तो दूसरी ओर बिहार में बिना किसी समस्या के सरकार चलाने की चुनौती। बिहार की तरक्की का हवाला देकर बीजेपी के साथ जाने का एक रास्ता निकल सकता है। नरेंद्र मोदी को बिहार में हरा कर अपना बदला ले चुके नीतीश क्या मोदी से हाथ मिलाएंगे ? अगर मान लिया कि वो ऐसा करेंगे तो फिर क्या उनकी पार्टी बिहार से बाहर निकल पाएगी। वहीं नीतीश दबाव की राजनीति करने के माहिर खिलाड़ी हैं। पहले महागठबंधन के नेता के तौर पर अपना नाम आगे करवाया और मुख्यमंत्री बन गए। अब देश में विपक्ष का चेहरा कौन होगा इसकी रेस लगी है। हालांकि नीतीश ने साफ कर दिया है कि उनकी बहुत छोटी पार्टी है और वो पीएम बनने का सपना नहीं देखते।

जेडीयू राज्य कार्यसमिति की बैठक में नीतीश ने कह दिया है कि वो किसी के पिछलग्गू नहीं बनेंगे। यानी उनके फैसले आगे भी अलग और चौंकाने वाले होते रहेंगे। राष्ट्रपति चुनाव के बाद 24 जुलाई को जेडीयू ने राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक बुलाई है। 28 जुलाई से बिहार विधान सभा का मॉनसून सत्र शुरू हो रहा है। यानी महागठबंधन की लड़ाई फिलहाल चलती रहेगी और नीतीश अपनी राह चलते रहेंगे।