जब नीतीश ने कहा वो “आप” के साथ हैं

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यूपी में नीतीश खुद के साथ सपा और कांग्रेस के व्यवहार से काफी मर्माहत हुए। RLD ने भी धोखा ही दिया। उन्हें उम्मीद थी कि सपा और कांग्रेस अपने गठबंधन में थोड़ी जगह देकर महागठबंधन का हिस्सा बनाने की कोशिश करेंगे।

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नीतीश कुमार ने यूपी में काफी मेहनत भी की थी और कुर्मी वोटरों को थोड़ा बहुत जोड़ा भी था लेकिन सपा-कांग्रेस की तरफ से ऐसा कुछ भी नहीं हुआ तो जेडीयू ने यूपी चुनाव से खुद के अलग होने का ठीकरा कांग्रेस और सपा पर फोड़ने में देर भी नहीं की। यूपी में अकेले लड़ते तो सीट तो नहीं ही निकलती लेकिन उनके उम्मीदवार थोड़ा बहुत जो भी कुर्मी वोट काटते वो बीजेपी को ही नुकसान पहुंचाता।

कांग्रेस और सपा से मिले इसी दर्द का नतीजा था कि नीतीश ने नोटबंदी समेत कई मुद्दों पर खुद को कांग्रेस-सपा-राजद के साथ खड़ा दिखाने में 50 दिन बाद भी जल्दबाजी नहीं की। नोटबंदी पर नीतीश रस्सी पर चलकर और बाएं-दायें पैर हिलाकर करतब दिखाने वाले किसी कलाकार की तरह संतुलित बयान देते रहे। दरअसल नोटबंदी पर नीतीश के बयानों में दिख रहे उन्नीस-बीस के फर्क के पीछे भी 19-20 ही है यानि 2019 का लोकसभा और फिर 2020 का विधानसभा।

मोदी विरोधी खेमे से बाहर निकलने के लिए रही-सही कसर ममता ने पूरी कर दी। नोटबंदी पर नीतीश के समर्थन को लेकर ममता के गद्दार कहे जाने से आहत नीतीश नोटबंदी पर अपने स्टैंड को और आगे बढ़ाते रहे। इससे एक तरफ जहाँ बिहार में सहयोगी आरजेडी पर भी “ठीक” से रहने का दवाब बना, वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रीय राजनीति में भी नीतीश ने मोदी विरोधियों का माथा झकझोर दिया। सभी राजनीतिक पार्टियों के साथ-साथ जनता भी नीतीश के इस डायवर्सन से कंफ्यूज हुई।

इस प्रकरण के साथ-साथ केंद्र के साथ टकराव के कई दूसरे मामलों में ममता के तेवर से देश में मोदी विरोधी खेमे का नेतृत्व करने की ममता की जल्दबाजी और महत्वाकांक्षा भी दिख गयी। दिल्ली की तरफ जाने वाले नेशनल हाईवे को कांग्रेस,सपा और TMC जैसे सहयोगियों से ही “जाम” देखकर नीतीश ने हाईवे के आसपास के गाँव से होकर निकलने के लिए अपनी गाड़ी का रास्ता मोड़ लिया। नीतीश कुमार को अब इस दूसरे संकरे रास्ते पर मंजिल की तरफ ले जाने वाले कुछ नये साथियों की तलाश है। भरोसे के इस नए साथियों में आप और लेफ्ट के अलावा कुछ छोटे दल हो सकते हैं। हालाकि केजरीवाल भी खुद को मोदी विरोधी चेहरा स्थापित करने की महत्वाकांक्षा जाहिर करते रहे हैं। ऐसे में भरोसे का साथी कौन होगा ये कहना अभी मुश्किल है।

यूपी चुनाव के नतीजे पर बहुत कुछ निर्भर करेगा क़ि राष्ट्रीय राजनीति में नीतीश का आगे का रुख क्या होगा। सपा-कांग्रेस जीती तो नये साथियों को जोड़ने की कवायद नीतीश तेज करेंगे। वहीँ बीजेपी की जीत से नीतीश को उन लोगों को अंगूठा दिखाने का मौक़ा मिलेगा जिन्होंने उन्हें भाव नहीं दिया। हालाकि बीजेपी की जीत से मोदी के लिए 2019 का रास्ता और साफ़ भी हो जायेगा। यदि ऐसी स्थिति हुई तो फिर नीतीश आने वाले दिनों में केंद्र से जुड़े दूसरे मुद्दों पर भी उस रस्सी वाले कलाकार की तरह ही करतब करते दिखें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

मौका था आम बजट पर प्रतिक्रिया देने का । बजट पर प्रतिक्रिया देने के बाद बाकी सवाल भी किए गए । टाइम्स नाउ के संवाददाता  प्रकाश सिंह ने पूछा की यूपी, पंजाब के विधान सभा चुनाव में नीतीश कुमार किसके साथ हैं। नीतीश कुमार ने हाज़िरजवाब देते हुए कहा हम आप के साथ हैं। ये जवाब एक साथ दो सवाल पैदा कर गया। पहला पत्रकार के सवाल को टालने के लिए ऐसा कह गए या फिर आप पार्टी के साथ होने का ये संकेत है। दरअसल पांच राज्यों में हो रहे विधान सभा चुनाव में नीतीश की पार्टी चुनाव नहीं लड़ रही इसका मलाल है। यही वजह है कि किसी राज्य में चुनाव प्रचार करने नहीं जा रहे ।महागठबंधन की सरकार बिहार में है फिलहाल एनडीए में जाने का सवाल नहीं। ऐसे में दोनों से अलग एक नया समीकरण बनाने की संभवना से इंकार नहीं किया जा सकता।

दिल्ली चुनाव के बाद सोशल मिडिया पर ये चुटकुला खूब चला था – बीजेपी के उम्मीदवार जब हाथ जोड़कर लोगों के पास जाते थे और पूछते थे कि बताइए वोट देंगे न, किसे देंगे वोट ? लोग कहते थे – निश्चिन्त रहें, “आप” को ही देंगे। लोगों ने वही किया। क्या नीतीश कुमार के उस जवाब में भी ऐसा ही कुछ छिपा है ?