कहाँ से आते हैं ये दरिन्दे ?

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मेरा दुःख इतना गहरा है कि मुझे डर है कि कहीं मेरी पूरी शख्शियत ही न बदल जाए. हाँ मैं कई बार डर कर रात को जाग जाती हूँ. मुझे महसूस होता है कि मेरे हाथ-पाँव कठुआ की उस बच्ची के ही हैं. काँप जाती हूँ ये सोच कर कि उस फूल सी कोमल शरीर वाली बच्ची ने कैसे झेला होगा वो सब. ऐसे ही काँप गई थी निर्भया के हादसे को जानकर. सूरत की उस 11 साल की बच्ची के 86 घाव मानो मेरे ही शरीर पर उभर आए हैं. जब-जब ऐसे किसी घटना की जानकारी मिलती है, मैं हिल जाती हूँ. कई बार लगता है कि हमारे ही बीच में न जाने कितने दानव छिपे बैठें हैं और हमें उसका इल्म भी नहीं. इंसानियत पर से भरोसा उठता हुआ महसूस होता है.

मसला ये है कि इस दर्द का इलाज क्या है. हम लाख सरकारों को कोसें, इसका कोई बहुत बड़ा हल निकलता मालुम नहीं होता. सरकार-प्रशासन के खिलाफ आवाज जरुर बुलंद होनी चाहिए पर समाज के नाते हमारी जवाबदेही भी कम नहीं. खासकर महिलाएं अगर नहीं जागीं तो हो सकता है कि वर्त्तमान परिस्थितियों को देखते हुए मां-बाप/परिवार वाले उनकी सुरक्षा का हवाला देकर उन्हें वापस घरों में कैद करना न शुरू कर दें. नुक्सान सबसे ज्यादा हमेशा की तरह बेटियों का ही होगा.

किसी भी समस्या को जड़ से कैसे ख़त्म किया जाए, हमारी कोशिश उसी दिशा में होनी चाहिए. ऐसा तो कभी भी नहीं हो पाएगा कि समाज में कोई गुनाह ही न हो पर हालात बदलने की पुरजोर कोशिश जरुर की जा सकती है. सरकारें कठोर कानून बनाएं और उतनी ही कठोरता से प्रशासन उस पर अमल करे यह जरुरी है. ऐसा समझा जाता है कि इससे भय व्याप्त होगा. पर कहीं न कहीं इस कानून का डर हर किसी में नहीं है जिस वजह से ये घटनाएं होती ही जा रही हैं. ऐसा क्यूँ हो रहा है ये समझना समय की मांग है.

मैं कोई मनोवैज्ञानिक नहीं पर मेरा मानना है कि किसी व्यक्ति के हैवान बनने में समाज का भी योगदान होता है, ठीक उसी तरह जिस तरह किसी की बेटी के साथ ऐसा हो जाता है और लोगों को भनक भी नहीं होती. जीवन के आपाधापी में हम ठहरना भूल गए, रुक कर अपने आसपास वाले लोगों का हाल-चाल लेना भूल गए. आर्थिक विकास तो हो रहा है पर सामाजिक विकास पिछड़ गया है. समय ऐसा आ चुका है कि समाज को ही सुरक्षा प्रहरी बनना होगा और एक-दूसरे का ख़याल रखना होगा. खासकर बाल सुरक्षा के मुद्दे पर हमें ही सजग होना होगा. अगर बच्चों का माँ-बाप और परिवार से भरोसा टूट गया तो फिर बचेगा ही क्या.

अभिभावक होने के नाते हमारी जिम्मेदारियां काफी बढ़ गईं हैं. हमें बच्चों को ऐसे बड़ा करना होगा कि वे समझदार और संवेदनशील बनें. शुरू से ही उन्हें कलात्मक गतिविधियों में लगाएं, साथ ही हर बच्चा खेल-कूद में भाग ले यह भी जरुरी है. इस तरह न सिर्फ उनमें सकारात्मक सोच का विकास होगा बल्कि अपनी ऊर्जा को भी वे सही दिशा दे पाएंगे. कहते हैं न खाली मन शैतान का घेरा. यह भी जरुरी है कि अभिभावक अपने बच्चों को पूरा समय दें. मैंने देखा है कि अगर बच्चों को सही मार्गदर्शन ना मिले तो वो अपना समय इंटरनेट पर बरबाद करते हैं और जाने-अनजाने बेहद कम उम्र में उनका सामना ऐसी चीजों से होता है जिसके लिए वो तैयार नहीं हैं. अभिभावक या परिवार वाले ही दोस्ताना तरीके से बच्चों को सही-गलत का ज्ञान दे सकते हैं.

पर हमारी जिम्मेदारी इतने से ही ख़त्म नहीं होती. चूंकि हम समाज में रहते हैं हमें अच्छी बातें अपने परिवार, मित्र या हमारे समकक्ष काम करने वाले लोगों के बच्चों के साथ भी साझा करनी चाहिएं. बच्चों को सप्ताह में एक बार समूह में एक साथ कहीं ले जाएं और उनके मानसिक विकास में मदद करें.

स्कूल/कॉलेज को भी इस दिशा में ठोस प्रयास करने चाहिए जिससे छात्र-छात्राओं में आत्म-जागृति आए.

इससे बुरा क्या हो सकता है कि दादाजी की उम्र का आदमी अपनी पोती सरीखी बच्ची के साथ ऐसा करता है. ऐसे तो कोई मां-बाप अपने बच्चे को ये शिक्षा नहीं दे पाएगा कि अपने से बड़ों की इज्जत करनी चाहिए. खतरे में हमारी संस्कृति और भारतीयता भी है. जिस दश में बुजुर्गों का सम्मान और आपसी भाईचारे की बातें होती थीं वहां बच्चों की बली दी जा रही है. स्त्री देह की लालसा में लोग आपा खो रहे हैं …इस कदर मानो उनके अन्दर कोई शैतान बैठा हो. ऐसा व्यक्ति तैयार कैसे होता है ये जानने में भी मेरी रूची है. क्या उनके अन्दर कभी किसी सुन्दर भावना का स्थान नहीं रहा ?

बहुत पहले डाकू वाली कहानी सुनी थी कि एक डाकू को फांसी दी जा रही थी तब उसने आखिरी इच्छा में अपनी माँ से मिलने की ख्वाहिश रखी. माँ आई तो उसका कान काट लिया और कहा कि अगर तुमने मुझे बचपन में की गई पहली चोरी पर ही रोक दिया होता तो मेरा हस्र ये आज नहीं हो रहा होता. क्या ये बात यहाँ सही होगी ? सजा तो जरुर होनी चाहिए पर क्या इस सजा से समाज सीख लेगा. या इस हो-हल्ले के बाद फिर से शांति बहाल हो जाएगी जब तक कि कोई और बेटी किसी दरिन्दे की भेट ना चढ़ जाए.

मैं तो चाहती हूँ कि इन दरिंदों के परिवार वालों से भी सवाल किया जाए कि समाज के लिए ये ज़हर उन्होंने कैसे तैयार किया. उन सब बातों का अध्ययन किया जाए और उससे सीख ली जाए.

मनीषा प्रकाश