क्यूं खास है विष्णु की धरती गया पिंडदान के लिए!

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पटना: भगवान विष्णु की धरती और बिहार के फल्गु नदी के तटवर्ती गया में पिंडदान का अपना खास महत्व है। मान्यता है कि पिंडदान करने से पुरखों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। मनुष्य पर देव ऋण, गुरु ऋण और पितृ ऋण होते हैं। माता-पिता की सेवा करके मरणोपरांत पितृपक्ष में पूर्ण श्रद्धा से श्राद्ध करने पर पितृऋण से मुक्ति मिलती है। गया में विधिवत श्राद्ध करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से अमावस्या तक के 15 दिन पितृपक्ष के होते हैं। इस दौरान सनातन धर्मावलंबी पितरों का पिंडदान करते हैं। गया को विष्णु का नगर माना जाता है। यह मोक्ष की भूमि कहलाती है।

गरुड़ पुराण के अनुसार गया जाने के लिए घर से निकले एक-एक कदम पितरों को स्वर्ग की ओर ले जाने के लिए सीढ़ी बनाते हैं। विष्णु पुराण के अनुसार गया में पूर्ण श्रद्धा से पितरों का श्राद्ध करने से उन्हें मोक्ष मिलता है। मान्यता है कि गया में भगवान विष्णु स्वयं पितृ देवता के रूप में उपस्थित रहते हैं, इसलिए इसे पितृ तीर्थ भी कहते हैं।

यह भी मान्यता है कि गया भस्मासुर के वंशज दैत्य गयासुर की देह पर फैला है। कहते हैं कि गयासुर ने ब्रह्माजी को अपने कठोर तप से प्रसन्न कर वरदान मांगा कि उसकी देह देवताओं की भांति पवित्र हो जाए और उसके दर्शन से लोगों को पापों से मुक्ति मिल जाए।

वरदान मिलने के पश्चात स्वर्ग में जन्संख्या बढ़ने लगी और लोग अधिक पाप करने लगे। इन पापों से मुक्ति के लिए वे गयासुर के दर्शन कर लेते थे। इस समस्या से बचने के लिए देवताओं ने गयासुर से कहा कि उन्हें यज्ञ के लिए पवित्र स्थान दें। गयासुर ने देवताओं को यज्ञ के लिए अपना शरीर दे दिया।

कहा जाता है कि दैत्य गयासुर जब लेटा तो उसका शरीर पांच कोस में फैल गया। यही पांच कोस का स्थान आगे चलकर गया के नाम से जाना गया। गया के मन से लोगों को पाप मुक्त करने की इच्छा कम नहीं हुई, इसलिए उसने देवताओं से फिर वरदान की मांग कि यह स्थान लोगों के लिए पाप मुक्ति वाला बना रहे। जो भी श्रद्धालु यहां श्रद्धा से पिंडदान करते हैं, उनके पितरों को मोक्ष मिलता है।