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कालजयी कवि नागार्जुन की 109वीं जयंती पर उनकी पांच कविताएं जो आज भी हैं प्रासंगिक

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MB DESK: बिहार की मिट्टी में ना जाने कितने ही प्रतिभाओं ने जन्म लिया. कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जहां बिहारियों ने अपनी छाप नहीं छोड़ी हो. हर जगह बिहारियों ने अपनी प्रतिभा के दम पर झंडे गाड़े हैं और देश में ही नहीं बल्कि विश्व में अपनी एक अलग पहचान कायम की है. साहित्य के क्षेत्र में भी बिहार ने कई मणि दिए हैं. इनमें से एक हैं कालजयी कवि नागार्जुन. विश्व भर में नागार्जुन के नाम से प्रख्यात कवि का पूरा बैधनाथ मिश्र नागार्जुन है.

कवि नागार्जुन का जन्म 30 जून, 1911 को मधुबनी के सतलखा गांव में जेष्ठ पूर्णिमा के दिन हुआ था. वहीं 5 नवंबर, 1998 में उनकी मृत्यु हो गई थी. वो प्रगतिवादी विचारधारा के लेखक और कवि थे. नागार्जुन ने 1945 ई. के आसपास साहित्य सेवा के क्षेत्र में क़दम रखा. शून्यवाद के रूप में नागार्जुन का नाम विशेष उल्लेखनीय है. हिन्दी साहित्य में उन्होंने ‘नागार्जुन’ और मैथिली में ‘यात्री’ उपनाम से रचनाओं का सृजन किया. नागार्जुन उन कवियों में से हैं जिनकी कविता किसी आयतित आंदोलन की देन नहीं बल्कि प्रगतिशील मूल्यों पर विश्वास करने वाली उस सशक्त परंपरा का महत्वपूर्ण अंग हैं, जिसने किसान, मजदूर, संघर्ष और नारी मुक्ति की कविता का केंद्रीय विमर्श बना दिया.

नागार्जुन ने साहित्य की सभी विधाओं में अपने लेखन प्रतिभा का परिचय दिया. जैसे कविता, कथा साहित्य, निबंध, अनुवाद, यात्रा वृतांत, साक्षात्कार इत्यादि विधाओं में रचनात्मक लेखन किया. परंपरागत प्राचीन पद्धति से संस्कृत की शिक्षा प्राप्त करने वाले बाबा नागार्जुन हिन्दी, मैथिली, संस्कृत और बांग्ला में कविताएं लिखते थे. इसके अतिरिक्त इन्होंने मैथिली में चित्रा, पत्रहीन नग्न गाछ, संस्कृत में धर्मलोक दशकम्, देशदशकम्, कृषकदशकम्, श्रमिकदशकम् लिखे.

नागार्जुन को 1965 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से उनके ऐतिहासिक मैथिली रचना पत्रहीन नग्न गाछ के लिए 1969 में नवाजा गया था. उन्हें साहित्य अकादमी ने 1994 में साहित्य अकादमी फेलो के रूप में नामांकित कर सम्मानित भी किया था. हिंदी में उनकी बहुत-सी काव्य पुस्तकें हैं. यह सर्वविदित है. उनकी प्रमुख रचना-भाषाएं मैथिली और हिंदी ही रही हैं. मैथिली उनकी मातृभाषा है और हिंदी राष्ट्रभाषा के महत्व से उतनी नहीं जितनी उनके सहज स्वाभाविक और कहें तो प्रकृत रचना-भाषा के तौर पर उनके बड़े काव्यकर्म का माध्यम बनी. अबतक प्रकाश में आ सके उनके समस्त लेखन का अनुपात विस्मयकारी रूप से मैथिली में बहुत कम और हिंदी में बहुत अधिक है. अपनी प्रभावान्विति में ‘अकाल और उसके बाद’ कविता में अभिव्यक्त नागार्जुन की करुणा साधारण दुर्भिक्ष के दर्द से बहुत आगे तक की लगती है.

आज महान लेखक/कवि की 106वीं जयंती है ऐसे में उनकी कुछ कविताएं जिन्हें आज भी लोग पढ़ते और अपने जीवन से जुड़ा पाते हैं वो इस प्रकार है-

1. बाल झबरे, दृष्टि पैनी, फटी लुंगी नग्न तन
किन्तु अन्तर्दीप्‍त था आकाश-सा उन्मुक्त मन
उसे मरने दिया हमने, रह गया घुटकर पवन
अब भले ही याद में करते रहें सौ-सौ हवन ।

क्षीणबल गजराज अवहेलि‍त रहा जग-भार बन
छाँह तक से सहमते थे शृंगालों के प्राण-मन
नहीं अंगीकार था तप-तेज को नकली नमन
कर दिया है रोग ने क्या खूब भव-बाधा शमन !

राख को दूषित करेंगे ढोंगियों के अश्रुकण
अस्थि-शेष-जुलूस का होगा उधर फिल्मीकरण
शादा के वक्ष पर खुर-से पड़े लक्ष्मी-चरण
शंखध्वनि में स्मारकों के द्रव्य का है अपहरण !

रहे तन्द्रा में निमीलित इन्द्र के सौ-सौ नयन
करें शासन के महाप्रभु क्षीरसागर में शयन
राजनीतिक अकड़ में जड़ ही रहा संसद-भवन
नेहरू को क्या हुआ, मुख से न फूटा वचन ?

क्षेपकों की बाढ़ आई, रो रहे हैं रत्न कण
देह बाकी नहीं है तो प्राण में होंगे न व्रण ?
तिमिर में रवि खो गया, दिन लुप्त है, बेसुध गगन
भारती सिर पीटती है, लुट गया है प्राणधन !

2. जो नहीं हो सके पूर्ण-काम
मैं उनको करता हूँ प्रणाम ।

कुछ कुण्ठित औ’ कुछ लक्ष्य-भ्रष्ट
जिनके अभिमन्त्रित तीर हुए;
रण की समाप्ति के पहले ही
जो वीर रिक्त तूणीर हुए !
उनको प्रणाम !

जो छोटी-सी नैया लेकर
उतरे करने को उदधि-पार;
मन की मन में ही रही¸ स्वयँ
हो गए उसी में निराकार !
उनको प्रणाम !

जो उच्च शिखर की ओर बढ़े
रह-रह नव-नव उत्साह भरे;
पर कुछ ने ले ली हिम-समाधि
कुछ असफल ही नीचे उतरे !
उनको प्रणाम !

एकाकी और अकिंचन हो
जो भू-परिक्रमा को निकले;
हो गए पँगु, प्रति-पद जिनके
इतने अदृष्ट के दाव चले !
उनको प्रणाम !

कृत-कृत नहीं जो हो पाए;
प्रत्युत फाँसी पर गए झूल
कुछ ही दिन बीते हैं¸ फिर भी
यह दुनिया जिनको गई भूल !
उनको प्रणाम !

थी उम्र साधना, पर जिनका
जीवन नाटक दुखान्त हुआ;
या जन्म-काल में सिंह लग्न
पर कुसमय ही देहान्त हुआ !
उनको प्रणाम !

दृढ़ व्रत औ’ दुर्दम साहस के
जो उदाहरण थे मूर्ति-मन्त ?
पर निरवधि बन्दी जीवन ने
जिनकी धुन का कर दिया अन्त !
उनको प्रणाम !

जिनकी सेवाएँ अतुलनीय
पर विज्ञापन से रहे दूर
प्रतिकूल परिस्थिति ने जिनके
कर दिए मनोरथ चूर-चूर !
उनको प्रणाम !

3. यहाँ, गढ़वाल में
कोटद्वार-पौड़ी वाली सड़क पर
ऊपर चक्करदार मोड़ के निकट

मकई के मोटे टिक्कड़ को
सतृष्ण नज़रों से देखता रहेगा अभी
इस चालू मार्ग पर
गिट्टियाँ बिछाने वाली मज़दूरिन माँ
अभी एक बजे आएगी
पसीने से लथपथ
निकटवर्ती झरने में
हाथ-मुँह धोएगी
जूड़ा बान्धेगी फिर से

और तब
शिशु को चूमकर
पास बैठा लेगी
मकई के टिक्कड़ से तनिक-सा
तोड़कर
बच्चे के मुँह में डालेगी

उसे गोद में भरकर
उसकी आँखों में झाँकेगी
पुतलियों के अन्दर
अपनी परछाईं देखेगी
पूछेगी मुन्ना से :
मेरी पुतलियों में देख तो, क्या है.

वो हंसने लगेगा …
माँ की गर्दन को बाँहों में लेगा

तब, उन क्षणों में
शिशु की स्वच्छन्द पुतलियों में
बस, माँ ही प्रतिबिम्बित रहेगी …

दो-चार पलों के लिए
सामने वाला टिक्कड़
यों ही धरा रहेगा …
हरी मिर्च और नमक वाली चटनी
अलग ही धरी होगी
चौथी पीढ़ी का हमारा वो प्रतिनिधि
बछेन्द्रीपाल का भतीजा है !

  4. खड़ी हो गई चाँपकर कंकालों की हूक

नभ में विपुल विराट-सी शासन की बंदूक

उस हिटलरी गुमान पर सभी रहें है थूक

जिसमें कानी हो गई शासन की बंदूक

बढ़ी बधिरता दस गुनी, बने विनोबा मूक

धन्य-धन्य वह, धन्य वह, शासन की बंदूक

सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक

जहाँ-तहाँ दगने लगी शासन की बंदूक

जली ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक

बाल न बाँका कर सकी शासन की बंदूक

5. खुब गए

दूधिया निगाहों में

फटी बिवाइयोंवाले खुरदरे पैर

धँस गए

कुसुम-कोमल मन में

गुट्ठल घट्ठोंवाले कुलिश-कठोर पैर

दे रहे थे गति

रबड़-विहीन ठूँठ पैडलों को

चला रहे थे

एक नहीं, दो नहीं, तीन-तीन चक्र

कर रहे थे मात त्रिविक्रम वामन के पुराने पैरों को

नाप रहे थे धरती का अनहद फासला

घण्टों के हिसाब से ढोये जा रहे थे !

देर तक टकराए

उस दिन इन आँखों से वे पैर

भूल नहीं पाऊंगा फटी बिवाइयाँ

खुब गईं दूधिया निगाहों में

धँस गईं कुसुम-कोमल मन में

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