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‘सोंस’-गांगेय डाल्फिन की कहानी

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दीपक कुमार सिंह

‘‘वो देखो, ‘मुस्कान’! कहां? कहां?’’…. कॉलेज की छात्राओं ने उधर देखते हुए समवेत स्वर में पूछा। ‘‘वापस गोता लगा गयी’’ – कोमल ने दूरबीन आंखों से हटाते हुए कहा। विक्रमशिला डाल्फिन आश्रयणी स्टूडेन्ट्स क्लब, भागलपुर का दल वन विभागीय 24-सीटर मोटरबोट द्वारा आश्रयणी के भ्रमण पर था।

आश्रयणी की पारिस्थितिकी एवं वन्यजीवन से आगामी पीढ़ी के संभावित वन्य जीवन-संरक्षकों, अर्थात् स्कूल- कॉलेज के छात्र-छात्राओं, को छुट्टी के दिन भागलपुर स्थित गंगा आश्रयणी में मोटरबोट से भ्रमण कराना, वन विभाग के कर्मियों एवं स्थानीय पक्षीविदों द्वारा आश्रयणी के वन्यजीवन यथा डाल्फिन, घड़ियाल, कछुओं, उदबिलावों, स्थानीय एवं प्रवासी पक्षियों के विषय में जानकारी देना, दोपहर में नदी के बीचों-बीच रेतीले टापू पर लगाये गये टेन्ट में भोजन-व्यवस्था, टापू पर पैदल मार्च के दौरान गांगेय पारिस्थितिकी का वर्णन करना इत्यादि उन्हें एक रोमांचक अनुभव प्रदान करने के साथ-साथ उनके बीच जागरूकता के प्रचार-प्रसार एवं डाल्फिन पारिस्थितिकी संरक्षण हेतु स्थानीय वन विभाग एवं आश्रयणी प्रबंधन की एक बहुत कारगर पहल रही है। गांगेय डाल्फिन तथा ग्रेटर एडजुटेन्ट स्टार्क इनके बीच क्रमश: ‘मुस्कान’ एवं ‘फौजी’ नाम से विशेष रूप से लोकप्रिय हैं।

बिहार राज्य में लगभग 2500 किमी0 लम्बाई का नदियों का बृहत् जाल फैला हुआ है। इसके अतिरिक्त, अनगिनत नहरें एवं राष्ट्रीय वेटलैण्ड एटलस में चिन्हित लगभग 4500 आर्द्रभूमि क्षेत्र इस राज्य को जलीय वन्यजीवन पारिस्थितिकी हेतु परम उपयुक्त बनाते हैं। बिहार की नदियों में ‘गांगेय डाल्फिन’ की उपस्थिति को देखते हुए सरकार द्वारा दिनांक 22 अगस्त, 1990 को भागलपुर जिला में सुल्तानगंज से कहलगांव (60 किमी) तक की गंगा की मुख्यधारा को विक्रमशिला गांगेय डाल्फिन आश्रयणी के रूप में अधिसूचित किया गया, जो देश की एकमात्र गांगेय डाल्फिन आश्रयणी है।

गांगेय डाल्फिन को बिहार में प्रचलित नाम ‘सोंस’ से जाना जाता है। यह एक जलीय जीव है। सांस लेने हेतु क्षणिक रूप से जल से बाहर निकलकर पुनः गोता लगाना, अन्य थलजीवों की भांति शिशुओं को जल में सीधे जन्म देना, उन्हें जल में ही स्तनपान कराना आदि इसकी सामान्य क्रियाएं हैं। यह नदियों के जलीय पारिस्थितिकी तंत्र का अग्रणी (flagship) प्रजाति है। नदी के जल को स्वच्छ रखने एवं उसके पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में यह जीव एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

पूर्व में जनमानस के बीच डाल्फिन के संबंध में जागरूकता की कमी होने से उसे मछली समझा जाना, मछली हेतु मछुआरों एवं डाल्फिन के बीच स्पर्धा होने की भ्रांति होना, मछुआरों के जाल में फंसने से इसकी बहुधा मृत्यु होना, तेल हेतु इसका शिकार किया जाना, इसके संरक्षण हेतु वित्तपोषण का अभाव आदि अनेक कारणों से गांगेय डाल्फिन के संरक्षण एवं संवर्धन में कठिनाइयां रहीं। परन्तु बिहार के संरक्षणविद् स्थानीय तौर पर इसके अध्ययन एवं संरक्षण के प्रयास करते रहे।

वर्ष 2009 से राज्य सरकार एवं बिहार के संरक्षणविदों/पर्यावरणविदों द्वारा गांगेय डाल्फिन हेतु बड़े पैमाने पर संरक्षण प्रयास प्रारम्भ किये गये। राज्य के शीर्ष स्तर से किये गये प्रयासों के फलस्वरूप तत्कालीन प्रधानमंत्री, भारत सरकार द्वारा दिनांक 5 अक्टूबर, 2009 को गांगेय डाल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव के रूप में अंगीकार करने की घोषणा की गयी एवं तभी से इस दिन को ‘बिहार डाल्फिन दिवस’ के रूप में राज्य में मनाया जाने लगा। डाल्फिनमैन के नाम से विख्यात बिहार के पद्मश्री डा0 आर0 के0 सिन्हा द्वारा वर्ष 2010 में देश की पहली डाल्फिन संरक्षण कार्ययोजना का निरूपण कर केन्द्र सरकार को भेजा गया। राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2014 में पटना में राष्ट्रीय डाल्फिन शोध केन्द्र की स्थापना हेतु स्वीकृति दी गयी एवं इसके संचालन के लिये सोसायटी के गठन हेतु उप-नियम सृजित किये गये। केन्द्रीय सहायता के अभाव में राज्य संसाधन द्वारा वित्तपोषण प्रारम्भ किया गया। इससे आश्रयणी क्षेत्र में विभिन्न हितधारक समूहों के हितों को सम्बोधित करना – इको-टूरिज्म/जागरूकता भ्रमण हेतु 24-सीटर मोटरबोट का क्रय, प्रचार-प्रसार के कार्य, स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राओं को आश्रयणी क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र से जोड़ने हेतु विक्रमशिला गांगेय डाल्फिन आश्रयणी स्टूडेन्ट्स क्लब की स्थापना, मछुआरों के साथ बैठकें, उन्हें डाल्फिन-मित्र के रूप में विभागीय स्तर से पहचान देकर रिवरफ्रंट मोनिटरिंग एवं एंटी-पोचिंग कैम्प कर्मी तथा इको-टूरिज्म गाइड हेतु नियोजित करना, स्थानीय पर्यावरणविदों के साथ बैठकें एवं क्षेत्र भ्रमण करना, वार्षिक समारोह एवं सम्मान षिविर आयोजित करना आदि कार्य – नियमित रूप किया जाना संभव हुआ। सचित्र कार्टून पात्रों द्वारा पारिस्थितिकी तंत्र को स्कूली बच्चों के बीच लोकप्रिय बनाया गया। जाल काटकर उनमें फंसी डाल्फिन को मुक्त करने वाले मछुआरों एवं डाल्फिन को असामयिक मृत्यु से बचाने वाले नागरिकों को वित्तीय रूप से पुरस्कृत करने एवं डाफिन दिवस पर उन्हें सम्मानित करने हेतु राज्य सरकार द्वारा नियम प्रतिपादित किये गये। मुंगेर जिला के गंगा किनारे सोझी घाट पर इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने हेतु डाल्फिन केन्द्रित इको-टूरिज्म एवं संरक्षण केन्द्र-सह-पार्क स्थापित किया गया। गांगेय डाल्फिन आश्रयणी की प्रबंध योजना, 2018-2028 तैयार कर लागू की गयी। बिहार राज्य में गंडक, कोसी, महानन्दा एवं गंगा में वैज्ञानिक तकनीक से वर्ष 2017-18 में गांगेय डाल्फिन की गणना की गयी जिसमें उनकी संख्या 1464 पायी गयी। यह देष में उपलब्ध कुल संख्या का लगभग 50 प्रतिशत है।

डाल्फिन संरक्षण हेतु राज्य स्तर पर की गयी पहल एवं इस क्षेत्र में इसके अग्रणी होने का संज्ञान लेते हुए वर्ष 2017-18 से केन्द्र सरकार द्वारा बिहार राज्य में ‘एकीकृत पर्यावास विकास योजना’ अन्तर्गत डाल्फिन हेतु वित्तपोषण प्रारम्भ किया गया है जिससे डाल्फिन आश्रयणी क्षेत्र में सभी हितधारकों – मछुआरों, स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राओं, किसानों, संरक्षणविदों, सरकारी विभागों इत्यादि – को लक्षित किया जा रहा है। ‘प्रोजेक्ट डाल्फिन’ हेतु प्रारम्भिक प्रतिवेदन तैयार करने के लिये भारतीय वन्यप्राणी संस्थान, देहरादून द्वारा आयोजित वेबिनार में अन्य राज्यों के अतिरिक्त डाल्फिन संरक्षण में बिहार राज्य सरकार की गंभीरता, पहल एवं प्रयासों पर दिनांक 7 अगस्त, 2020 को विस्तृत रूप से चर्चा की गयी। दिनांक 15 अगस्त, 2020 को लाल किले की प्राचीर से माननीय प्रधानमंत्री, भारत सरकार द्वारा ‘प्रोजेक्ट डाल्फिन’ प्रारम्भ किये जाने की घोषणा की गयी।

इस प्रकार, वर्ष 1990 में बिहार सरकार द्वारा राज्य स्तर पर प्रारम्भ किये गये गांगेय डाल्फिन – ‘सोंस’ – के संरक्षण प्रयासों को एक तार्किक परिणति तक लाया जा सका है। अभी भी इसके संरक्षण एवं संवर्द्धन हेतु और अधिक कार्य किये जाने की आवष्यकता है। परन्तु अब राष्ट्रीय स्तर पर भी इसे यथोचित महत्व दिये जाने से यह तो निष्चित है कि – आने वाले समय में हमारी ‘मुस्कान’ की मुस्कान और गहरी होगी!!

(लेखक – दीपक कुमार सिंह, भा0प्र0से0,पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, बिहार सरकार में प्रधान सचिव, हैं)

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