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मोतिहारी केंद्रीय विश्वविधालय बना राजनीतिक अखाड़ा

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मोतिहारी: महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय मोतिहारी इन दिनों शिक्षा से ज्यादा विवाद को लेकर चर्चित हो रहा है। इसका कारण केंद्र में भाजपा की सरकार एवं स्थानीय सांसद सह केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधामोहन सिंह की बढ़ती दखलंदाजी को माना जा रहा है।

यही कारण है कि कार्यक्रम से बिहार सरकार के मंत्रियों के अलावा राजद एवं जदयू के नेताओं को विश्वविद्यालय से दूर रखा जा रहा है। कुछ लोग इसके लिए कुलपति डा. अरविंद अग्रवाल को जिम्मेवार मानते है। लेकिन मेरा मानना है कि सांसद सह केंद्रीय मंत्री स्थानीय होने के कारण कुलपति उन्हें किसी भी प्रकार से नाराज नहीं करना चाहते है। यही कारण है कि परोक्ष तौर पर विश्वविद्यालय एक प्रकार से भाजपा की मर्जी से चल रहा है।

अभी विश्वविद्यालय को राज्य सरकार से जमीन हस्तांतरित नहीं हुई है, ऐसे में राज्य सरकार की नाराजगी से क्या इसके विशाल भवन का सपना साकार हो पाएगा? यह सवाल चंपारण में चर्चा का केंद्र बनता जा रहा है। क्योंकि कुलपति दो बार राज्य सरकार के नेताओं को नाराज कर चुके है। अभी बिहार चुनाव एवं सरकार बदलने में काफी वक्त बाकी है।

कुलपति महात्मा गांधी के नाम पर एक ऐसे विश्वविद्यालय का सपना लिए पहुंचे है, जिसकी तुलना विदेश के बड़े विश्वविद्यालयों से की जा सके। जैसा कि वे दावा कर चुके है। लेकिन उनकी मीडिया से हो रही भिड़ंत एवं इसके प्रबंधन में भाजपा नेताओं का बढ़ता हस्तक्षेप उनके सपनों पर फिलहाल पूर्ण विराम लगा सकता है।

विश्वविद्यालय के लिए वातानुकूलित बस देने भर से मगां के विवि का कल्याण हो जाएगा, यह सोचना दूर की कौड़ी है। कुलपति को राज्य एवं केंद्र सरकार के बीच सामंजस्य बिठाकर चलना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। आज महागठबंधन के नेता कुलपति पर भाजपा की गोद में बैठने का आरोप लगा रहे है।

यह बात राज्य सरकार तक पहुंच रही है, जो विश्वविद्यालय के लिए भूखंड के अधिग्रहण एवं हस्तांतरण में बड़ा रोड़ा साबित होगा। जहां तक विश्वविद्यालय की स्थापना को लेकर क्रेडिट लेने की बात है तो पूरा चंपारण जानता है कि इसमें किसकी क्या भूमिका रही है।
केंद्रीय विश्वविद्यालय की मोतिहारी में स्थापना को लेकर चल रहे संघर्ष के दौरान गायब रहे भाजपा नेताओं की भूमिका दिल्ली जंतर-मंतर के कार्यक्रम के दौरान शुरू हुई। इसके बाद केंद्र में सरकार बदलने के बाद केंद्रीय मंत्री राधामोहन सिंह की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता कि उन्होंने लोकसभा, राज्यसभा से लेकर केंद्र की सरकार पर मोतिहारी में इसकी स्थापना के लिए अधिसूचना जारी करायी। लेकिन यह भी सर्वविदित है कि भाजपा इसके लिए किए गए संघर्ष से खुद को नवंबर 2008 से ही अलग रखे हुए था।

नीतीश कुमार की इंजीनियरिंग कॉलेज में की गई घोषणा के बाद इसके लिए जमीन खोजने में किस भाजपा नेता की भूमिका रही, इसके लिए आंदोलन की रूप रेखा किसने बनाई? इसका जबाब शायद भाजपा के किसी भी नेता के पास नहीं होगा। भाजपा नेता चंद्र किशोर मिश्र एवं हाल में पार्टी में आए अरूण कुमार यादव अवश्य आंदोलन से जुड़े रहे है। लेकिन बाद में श्री मिश्रा किसके दबाव में अलग हो गए यह आज तक लोग नहीं समझ पाए?

नगर सभापति प्रकाश अस्थाना अवश्य इसमें सक्रिय रूप से जुड़े रहे है और वे पूरी निष्ठा के साथ आंदोलन का साथ दिए है? लेकिन इसके जनप्रतिनिधियों का जुड़ाव जंतर-मंतर एवं सांसद श्री सिंह का संसद तक अवश्य रहा। बाद में सांसद ने सरकार बनने के बाद केंद्रीय मंत्री बनने के बाद श्री सिंह की भूमिका सकारात्मक रही और उन्होंने तेजी से इस पर कार्य किया इससे कोई इंकार नहीं कर सकता है।

लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की निष्ठा को भी चुनौती नहीं दी जा सकती है। जब पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल इस बात पर अड़ गए थे कि मोतिहारी में केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना नहीं की जाएगी। तो सीएम ने दो टूक कह दिया था कि वे इसके अलावा दूसरी जगह जमीन नहीं देंगे। वे इस पर कायम रहे। इसलिए महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति को अगर विश्वविद्यालय के भवन का सपना पूरा करना है तो उन्हें पक्ष एवं विपक्ष के बीच संतुलन साध कर चलना होगा। अन्यथा विश्वविद्यालय विवादों का केंद्र बना रहेगा।

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