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गुलज़ार है जिनसे साहित्य

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साहित्यकार, कथाकार, गीतकार, रचनाकार, पटकथा लेखक, निर्देशक, फिल्मकार और कवि गुलज़ार साहब, उर्दू और हिंदी अदब को अपनी शायरी से ‘गुलज़ार’ करने वाले मशहूर शायर का आज जन्मदिन है। खुद ही बता दिया था कि

चेसिस की तारीख़ पूछ लो
कब की मैन्युफैक्चर है वो
वरना अकसर ठग लेते हैं गाड़ियां बेचने वाले!
मेरी चेसिस की तारीख़
अट्ठारह अगस्त उन्नीस सौ चौंतीस है!!

यूँ तो कई नज़्में और गीत लिखा है पर किताबों पर क्या लिखा…पढ़िए

किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती हैं
महीनों अब मुलाकातें नहीं होती
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं
अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के पर्दों पर
बड़ी बेचैन रहती हैं क़िताबें
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है
जो कदरें वो सुनाती थी कि जिनके
जो रिश्ते वो सुनाती थी वो सारे उधरे-उधरे हैं
कोई सफा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है
कई लफ्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं
बिना पत्तों के सूखे टुंड लगते हैं वो अल्फ़ाज़
जिनपर अब कोई मानी नहीं उगते
जबां पर जो ज़ायका आता था जो सफ़ा पलटने का
अब ऊँगली क्लिक करने से बस झपकी गुजरती है
किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, वो कट गया है
कभी सीने पर रखकर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बनाकर
नीम सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
और महके हुए रुक्के
किताबें मँगाने, गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
उनका क्या होगा
वो शायद अब नही होंगे!!

उनके शब्दों की जादूगरी सर चढ़ कर बोलती है. पढ़िए कुछ और नज्में :

हम ने अक्सर तुम्हारी राहों में

रुक कर अपना ही इंतिज़ार किया

~

याद है इक दिन

मेरी मेज़ पे बैठे-बैठे

सिगरेट की डिबिया पर तुमने

एक स्केच बनाया था

आकर देखो

उस पौधे पर फूल आया है !

~

बदल जाओ वक्त के साथ,

या वक्त बदलना सीखो,

मजबूरियों को मत कोसों,

हर हाल में चलना सीखो।

~

आँखों को वीज़ा नहीं लगता, सपनों की सरहद नहीं होती, बंद आँखों से चला जाता हूं सरहद पार मेहंदी हसन से मिलने…

~

वक्त के सितम कम हसीं नहीं

आज है यहाँ कल कहीं नहीं

वक्त से परे अगर मिल गए कहीं

मेरी आवाज़ ही पहचान है

गर याद रहे….”

~

आओ फिर नज़्म कहें..

फिर किसी दर्द को सहलाकर सुजा ले आँखें

फिर किसी दुखती हुई रग में छुपा दें नश्तर

या किसी भूली हुई राह पे मुड़कर एक बार

नाम लेकर किसी हमनाम को आवाज़ ही दें लें

फिर कोई नज़्म कहे…..

~

अकेले रहे ज़िन्दगी भर अकेले,

न दिल साथ आया न ग़म साथ आये

यही रास्ते जिनकी मंज़िल नहीं थी

यही साथ थे बस यही साथ आये..!!

~

ना जाने कैसे परखता है

मुझे मेरा खुदा…

इम्तिहान भी सख्त लेता है

और मुझे हारने भी नहीं देता….!

~

कोई अटका हुआ है पल शायद,

वक़्त में पड़ गया है बल शायद।

दिल अगर है तो दर्द भी होगा,

इस का कोई नहीं है हल शायद।

~

तुमने तो कहा था

हर शाम हाल पूछेंगे तुम्हारा

तुम बदल गये हो या

तुम्हारे शहर में शाम नहीं होती..!

~

कुछ ऐसा सोच कर

शायद फ़रिश्तों ही से पढ़वा ले,

कभी मैं चाँद की तख़्ती पे लिख देता हूँ,

कोई शेर ‘ग़ालिब’ का

तो धो देता है या उसको कुतर के फाँक जाता है

पढ़ा-लिखा अगर होता ख़ुदा अपना

न होती गुफ़्तगू, तो कम से कम, चिट्ठी का आना-जाना तो रहता!”

~

जब गुज़रती है उस गली से सबा

ख़त के पुर्ज़े तलाश करती है,

अपने माज़ी की जुस्तुजू में बहार

पीले पत्ते तलाश करती है,

एक उम्मीद बार बार आ कर

अपने टुकड़े तलाश करती है,

बूढ़ी पगडंडी शहर तक आ कर

अपने बेटे तलाश करती है..।

~

इतना क्यों सिखाए जा रही हो ज़िंदगी,

हमें कौन से सदियां गुजारनी है यहाँ !

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