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स्वतंत्रता आंदोलन में भोजपुर कनेक्शन

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स्वाधीनता महासंग्राम से लेकर स्वतंत्रता आन्दोलन तक बिहार के भोजपुर क्षेत्र की क्रांतिकारी भूमिका रही है. अंग्रेजी सल्तनत को सर्वप्रथम मीरकासिम ने ही बक्सर में चुनौती दी थी, जो बिहार की ऊर्जा की पहली ललकार थी. जगदीशपुर के राजा, जो अपने जीवन के 80 बसंत बिता चुके थे, उनके हृदय में भी देश प्रेम की ज्वाला उदीप्त हो उठी थी.

वीर कुंवर सिंह ने न केवल अंग्रेजों के दांत खट्टे किये बल्कि बिहार के जमींदारों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश तक के राज घरानों को भी समरांगन में कूदने हेतु उत्साहित किया. जीवन की अंतिम साँस तक वे लड़ते रहे, किन्तु हार कभी न मानी. उनके भाई अमर सिंह ने भी बहादुरी का मिसाल कायम कर गये.

केवल क्रांतिकारी के रूप में ही नहीं बल्कि साहित्य एवं सांस्कृतिक रूप से भी भोजपुर बिहार को विभूषित करने का काम किया है. बाबू रघुबीर नारायण ने राष्ट्रीय प्ररिप्रेक्ष्य में भारत की गौरवगाथा का बखान बड़े ही मनोहारी रूप में किया है. इतना ही नहीं, इस जनपद में एक ऐसा लोक कलाकार ने जन्म लिया, जिसने अपने गीत एवं नाट्य-नाच कला से तत्कालीन समाज व्यवस्था को झकझोर दिया.

प्रोषितपतिका की विरह व्यथा, अबोध नाबालिग बालिका के पिता की उम्र के पुरुष के साथ विवाह संबंध की प्रथा एवं अन्य सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध उसने सांस्कृतिक युद्ध छेड़ दिया. लोक-जीवन को मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक अव्यवस्थाओं की ओर स्वरचित गीत-संगीत, नाट्य एवं नाच के माध्यम से जागृत किया और उस महान कलाकार का नाम था भिखारी ठाकुर.

भिखारी ठाकुर की कीर्ति भोजपुर के जनपदों एवं अमराईयों में आज भी गुंजायमान है. उन्होंने मात्र भोजपुर क्षेत्र में ही नहीं बल्कि बिहार के अन्य भूभागों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश एवं बंगाल तक अपनी कला का प्रदर्शन कर बिहार के गौरव को महिमामण्डित करने का काम किया.

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